दिल्ली में अचानक बहुत सारे लोग — खासकर महिलाएँ और बच्चे — गायब हो रहे हैं।

नई दिल्ली।
राजधानी दिल्ली में बीते कुछ हफ्तों से सोशल मीडिया और कुछ समाचार माध्यमों में यह दावा ज़ोर पकड़ता जा रहा है कि शहर से अचानक बड़ी संख्या में लोग, विशेषकर महिलाएँ और बच्चे, गायब हो रहे हैं। व्हाट्सएप मैसेज, इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियो के ज़रिये यह बात तेजी से फैल रही है कि दिल्ली में “मिसिंग पर्सन” के मामले असामान्य रूप से बढ़ गए हैं और पुलिस इस पर चुप है। इन दावों के बाद आम लोगों के बीच डर और असुरक्षा की भावना भी देखी जा रही है।

हालांकि, जब इस पूरे मामले को आंकड़ों और आधिकारिक बयानों के आधार पर देखा जाता है, तो तस्वीर कुछ अलग ही सामने आती है।

सोशल मीडिया पर फैलता डर

जनवरी 2026 की शुरुआत से ही सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट वायरल होने लगे जिनमें दावा किया गया कि केवल 10–15 दिनों में सैकड़ों महिलाएँ और बच्चे दिल्ली से लापता हो गए हैं। कुछ वीडियो में यह भी कहा गया कि यह एक संगठित गिरोह का काम है, जबकि कुछ पोस्ट में पुलिस पर लापरवाही के आरोप लगाए गए।

इन दावों की भाषा बेहद भावनात्मक थी, जिससे लोगों में घबराहट बढ़ी। कई माता-पिता ने अपने बच्चों को अकेले बाहर भेजना बंद कर दिया और महिलाएँ देर शाम घर से निकलने में डर महसूस करने लगीं।

दिल्ली पुलिस का पक्ष

दिल्ली पुलिस ने इन वायरल दावों को लेकर आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि राजधानी में “मिसिंग पर्सन” मामलों में कोई असामान्य या अचानक बढ़ोतरी नहीं हुई है। पुलिस के अनुसार, हर महीने दिल्ली में लापता व्यक्तियों के कुछ हजार मामले दर्ज होते हैं, जो पिछले कई वर्षों से लगभग समान स्तर पर हैं।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया पर जिस तरह से आंकड़ों को पेश किया जा रहा है, वह अधूरा और भ्रामक है। कई मामलों में लोग कुछ घंटों या एक-दो दिन के लिए संपर्क से बाहर होते हैं, जिन्हें भी “लापता” की श्रेणी में दर्ज कर लिया जाता है। बाद में वही लोग अपने-आप घर लौट आते हैं या पुलिस द्वारा खोज लिए जाते हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं?

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, जनवरी 2026 में दिल्ली में दर्ज किए गए लापता लोगों की संख्या पिछले साल के औसत महीनों के आसपास ही रही। इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे मामले थे जिनका समाधान कुछ ही दिनों में हो गया।

पुलिस का यह भी कहना है कि “लापता” का मतलब हमेशा अपहरण या गंभीर अपराध नहीं होता। कई बार बच्चे घर से नाराज़ होकर चले जाते हैं, बुज़ुर्ग रास्ता भटक जाते हैं, या काम की तलाश में आए लोग बिना बताए कहीं और चले जाते हैं।

महिलाएँ और बच्चे: क्यों बनते हैं चिंता का विषय?

महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों को लेकर समाज में स्वाभाविक रूप से ज़्यादा संवेदनशीलता होती है। यही वजह है कि जब भी इन वर्गों से जुड़े लापता मामलों की खबर सामने आती है, तो वह तेजी से फैलती है।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि महिलाओं और बच्चों के मामलों को प्राथमिकता पर लिया जाता है। ऐसे मामलों में तुरंत FIR दर्ज की जाती है, सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाते हैं और ज़रूरत पड़ने पर विशेष टीमें भी गठित की जाती हैं।

“पेड प्रमोशन” और अफवाहों का आरोप

पुलिस ने यह भी दावा किया है कि कुछ सोशल मीडिया अकाउंट जानबूझकर डर फैलाने के लिए इस मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। पुलिस के अनुसार, कुछ मामलों में यह देखा गया है कि डर फैलाने वाली सामग्री को पेड प्रमोशन के ज़रिये वायरल किया गया।

दिल्ली पुलिस ने चेतावनी दी है कि झूठी या भ्रामक जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

आम लोगों की चिंता

हालांकि पुलिस के बयानों के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर लोगों की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई परिवारों का कहना है कि आंकड़े चाहे जो कहें, लेकिन जब आसपास से किसी के गायब होने की खबर आती है, तो डर लगना स्वाभाविक है।

कुछ सामाजिक संगठनों का मानना है कि पुलिस को सिर्फ बयान देने के बजाय जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, ताकि लोग यह समझ सकें कि लापता होने की स्थिति में क्या करना है और अफवाहों से कैसे बचना है।

क्या करें अगर कोई लापता हो जाए?

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति लापता हो जाता है, तो सबसे पहले नज़दीकी पुलिस स्टेशन में तुरंत रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए। इसके अलावा दिल्ली पुलिस के ZIPNET जैसे पोर्टल पर भी जानकारी दी जा सकती है, जहां से लापता लोगों की खोज में मदद मिलती है।

पुलिस यह भी सलाह देती है कि सोशल मीडिया पर किसी भी अनverified पोस्ट को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सच्चाई ज़रूर जांच लें।

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