भारतीय समाज के निर्माण में महिला शिक्षकों की भूमिका आधार स्तंभ जैसी है। वे न केवल ज्ञान देती हैं, बल्कि संस्कार, आत्मविश्वास और समानता की सोच भी गढ़ती हैं। लेकिन उनकी वर्तमान दशा (स्थिति) और भविष्य की दिशा (संभावनाएँ)—दोनों पर गंभीर चर्चा ज़रूरी है।
सम्मान के साथ संघर्ष
समाज में शिक्षक को आदर मिलता है, पर महिला शिक्षकों को अक्सर अतिरिक्त पारिवारिक जिम्मेदारियों, कम वेतन (विशेषकर निजी/संविदा संस्थानों में) और कार्यस्थल असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।
ग्रामीण बनाम शहरी अंतर
ग्रामीण क्षेत्रों में महिला शिक्षक आज भी आवास, परिवहन और सुरक्षा जैसी बुनियादी चुनौतियों से जूझती हैं। शहरी इलाकों में अवसर अधिक हैं, पर प्रतिस्पर्धा और कार्यदबाव भी ज़्यादा है।
डिजिटल खाई
ऑनलाइन शिक्षा ने नए दरवाज़े खोले, लेकिन डिजिटल साक्षरता, उपकरणों की उपलब्धता और प्रशिक्षण की कमी कई महिला शिक्षकों के लिए बाधा बनी।
करियर प्रगति में रुकावट
प्रशासनिक/नेतृत्व पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है—प्रमोशन, प्रशिक्षण और निर्णय-निर्माण में बराबरी की ज़रूरत बनी हुई है।
भविष्य की दिशा (संभावनाएँ)
नीति और संरचनात्मक समर्थन
सरकारी योजनाएँ, समान वेतन, स्थायी नियुक्तियाँ, सुरक्षित कार्यस्थल और मातृत्व/लचीले कार्य प्रावधान महिला शिक्षकों की स्थिति मजबूत कर सकते हैं।
डिजिटल सशक्तिकरण
एडटेक प्रशिक्षण, हाइब्रिड मॉडल और स्थानीय भाषा में कंटेंट—इनसे महिला शिक्षक तकनीक की नेता बन सकती हैं।
नेतृत्व में भागीदारी
स्कूल प्रशासन, पाठ्यक्रम विकास और नीति-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़े—तो शिक्षा अधिक समावेशी और संवेदनशील होगी।
सामाजिक सोच में बदलाव
महिला शिक्षक को केवल “नौकरी” नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता और परिवर्तनकर्ता के रूप में देखना—यही दीर्घकालीन समाधान है।
भारतीय महिला शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि उनकी चुनौतियों को समझकर ठोस कदम उठाए जाएँ, तो वे न केवल कक्षाओं को बल्कि पूरे समाज को दिशा दे सकती हैं। दशा सुधारने से ही दिशा उज्ज्वल होगी।

मंजू देसवाल ( प्रिंसिपल, एमसीडी प्राइमरी स्कूल, मदनपुर खादर, दिल्ली)








2 Responses
Bahut acha kaha hai 💯
Bahut acche vichar, adhbhut