शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल
देश में चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने NEET-PG (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट-पोस्टग्रेजुएट) की कट-ऑफ में की गई भारी कमी की वैधता की जांच करने का फैसला किया है। अदालत ने कहा है कि यह मामला “शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाला गंभीर मुद्दा” है और इस पर गहराई से विचार किया जाना आवश्यक है।
NEET-PG देशभर के मेडिकल कॉलेजों में एमडी, एमएस और डिप्लोमा जैसे स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए एकमात्र राष्ट्रीय परीक्षा है। इस परीक्षा के माध्यम से हजारों एमबीबीएस स्नातक डॉक्टर विशेषज्ञता (स्पेशलाइजेशन) के लिए चयनित होते हैं। सामान्यतः इस परीक्षा में न्यूनतम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल तय होता है, जिसके आधार पर अभ्यर्थी काउंसलिंग प्रक्रिया में भाग लेने के पात्र होते हैं।
कट-ऑफ में भारी कमी क्यों विवादित हुई?
शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए पहले सामान्य वर्ग के लिए 50वां पर्सेंटाइल और आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के लिए 40वां पर्सेंटाइल न्यूनतम योग्यता तय की गई थी। लेकिन बाद में एक अधिसूचना जारी कर इस कट-ऑफ को काफी हद तक कम कर दिया गया। कुछ श्रेणियों में यह कट-ऑफ सिंगल डिजिट पर्सेंटाइल तक पहुंच गया, जिससे बहुत कम अंक पाने वाले उम्मीदवार भी काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए।
इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह से न्यूनतम योग्यता मानदंड को अचानक और अत्यधिक कम करना न केवल मनमाना है बल्कि इससे चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य में मरीजों की सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत इस बात की जांच करेगी कि क्या कट-ऑफ को इतनी बड़ी मात्रा में कम करना शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। न्यायाधीशों ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि “मुद्दा केवल सीटें भरने का नहीं है, बल्कि शिक्षा के स्तर को बनाए रखने का है।”
अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित परीक्षा प्राधिकरण से पूछा है कि वे यह स्पष्ट करें कि इतने बड़े स्तर पर कट-ऑफ घटाने का निर्णय किस आधार पर लिया गया और क्या इससे शैक्षणिक मानकों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने अदालत में दायर अपने जवाब में कहा है कि यह एक नीतिगत निर्णय है, जिसका उद्देश्य देशभर में खाली पड़ी स्नातकोत्तर चिकित्सा सीटों को भरना है। सरकार के अनुसार, कई राउंड की काउंसलिंग के बाद भी हजारों सीटें खाली रह गई थीं, जिनमें बड़ी संख्या सरकारी मेडिकल कॉलेजों की थी।
सरकार का तर्क है कि जब देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है, तब सीटों का खाली रहना सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी है। मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचे, शिक्षकों और अस्पताल सुविधाओं पर भारी निवेश किया जाता है। यदि सीटें खाली रहती हैं तो यह निवेश व्यर्थ चला जाता है।
सरकार ने यह भी कहा कि NEET-PG परीक्षा मूल रूप से उम्मीदवारों की रैंकिंग के लिए है, न कि उनकी बुनियादी चिकित्सकीय क्षमता का परीक्षण करने के लिए। सभी उम्मीदवार पहले से ही एमबीबीएस डिग्रीधारी और इंटर्नशिप पूरी कर चुके डॉक्टर होते हैं। विशेषज्ञता की वास्तविक दक्षता का मूल्यांकन तो एमडी या एमएस कोर्स के अंत में होता है।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कट-ऑफ में इतनी बड़ी गिरावट से मेरिट व्यवस्था कमजोर होगी। उनका तर्क है कि चिकित्सा क्षेत्र में विशेषज्ञ डॉक्टरों का चयन अत्यंत सावधानी से होना चाहिए, क्योंकि उनका सीधा संबंध मरीजों के जीवन और स्वास्थ्य से होता है।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि यदि बड़ी संख्या में सीटें खाली रह रही हैं तो इसका कारण केवल कट-ऑफ नहीं, बल्कि निजी मेडिकल कॉलेजों की ऊंची फीस और अन्य संरचनात्मक समस्याएं भी हो सकती हैं। ऐसे में समाधान कट-ऑफ कम करना नहीं, बल्कि फीस संरचना और काउंसलिंग प्रक्रिया में सुधार करना होना चाहिए।
उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि यदि बहुत कम अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को विशेषज्ञता में प्रवेश दिया जाएगा, तो इससे भविष्य में चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
व्यापक प्रभाव
यह मामला केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की पेशेवर शिक्षा नीति से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन गया है। एक ओर सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक डॉक्टर विशेषज्ञ बनें और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़े। दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों का चयन उच्च शैक्षणिक मानकों के आधार पर हो।
भारत में पहले से ही चिकित्सा शिक्षा को लेकर कई चुनौतियां हैं—सीटों की सीमित संख्या, निजी कॉलेजों की ऊंची फीस, ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और प्रशिक्षण की गुणवत्ता को लेकर सवाल। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले वर्षों की नीति दिशा तय कर सकता है।
आगे की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब मांगा है। आने वाली सुनवाई में दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क और साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे। अदालत इस बात पर विचार करेगी कि क्या यह निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों—विशेष रूप से समानता और गुणवत्ता—के अनुरूप है या नहीं।
यदि अदालत यह पाती है कि कट-ऑफ में कमी शिक्षा की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, तो वह सरकार के निर्णय को रद्द या संशोधित कर सकती है। वहीं यदि अदालत सरकार के तर्कों से संतुष्ट होती है, तो यह फैसला भविष्य में भी ऐसे नीतिगत बदलावों के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकता है।







