मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ते हुए 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जो पिछले कई वर्षों में पहली बार हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है, जिससे वैश्विक बाजार में अनिश्चितता और चिंता बढ़ गई है।
युद्ध जैसे हालात से बढ़ा दबाव
पिछले कुछ दिनों में मिडिल ईस्ट क्षेत्र में हालात लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने कई सैन्य ठिकानों और रणनीतिक स्थानों पर हमले किए हैं।
इस संघर्ष के कारण तेल उत्पादन और आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा है। कई तेल उत्पादक देशों ने सुरक्षा कारणों से उत्पादन घटा दिया है, जबकि कुछ जगहों पर तेल के परिवहन में भी बाधा आई है। इसके चलते वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति कम हो गई है और कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है।
स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ बना सबसे बड़ा खतरा
मिडिल ईस्ट में तेल व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ माना जाता है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी समुद्री मार्ग से होता है।
वर्तमान संघर्ष के दौरान इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। कई तेल टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से इस क्षेत्र से गुजरना बंद कर दिया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ा है और बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ने लगी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा तो तेल की कीमतें और अधिक बढ़ सकती हैं। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले समय में कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं।

वैश्विक बाजार पर असर
तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
जब तेल महंगा होता है तो परिवहन, बिजली उत्पादन और औद्योगिक गतिविधियों की लागत बढ़ जाती है। इसके कारण कई देशों में महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है।
हाल के दिनों में तेल की कीमतों में तेजी के बाद कई देशों के शेयर बाजारों में भी गिरावट दर्ज की गई है। निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ने से वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी दबाव देखा गया है।
तेल कीमतों में ऐतिहासिक उछाल
वर्तमान स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) दोनों की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत 108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, जबकि WTI भी 100 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह वृद्धि पिछले कुछ वर्षों की सबसे तेज वृद्धि में से एक है। केवल एक सप्ताह के भीतर तेल की कीमतों में लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक उछाल देखा गया है।
तेल उत्पादन पर हमलों का असर
मिडिल ईस्ट के कई देशों में ऊर्जा ढांचे पर हमले होने की खबरें भी सामने आई हैं। हाल ही में सऊदी अरब की एक प्रमुख तेल रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ था, जिसके कारण कुछ समय के लिए उत्पादन रोकना पड़ा।
हालांकि नुकसान ज्यादा नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ा दी और तेल की कीमतों को ऊपर धकेल दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे हमले जारी रहते हैं तो तेल उत्पादन और निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत पर संभावित असर
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में से एक है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इससे परिवहन लागत बढ़ेगी और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।
सरकार आम तौर पर ऐसी परिस्थितियों में टैक्स समायोजन, सब्सिडी या रणनीतिक भंडार का उपयोग करके कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश करती है।
आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों के अनुसार तेल बाजार का भविष्य काफी हद तक मिडिल ईस्ट की स्थिति पर निर्भर करेगा। यदि तनाव कम होता है और तेल आपूर्ति सामान्य होती है तो कीमतें स्थिर हो सकती हैं।
लेकिन अगर संघर्ष और बढ़ता है या तेल उत्पादन और परिवहन पर ज्यादा असर पड़ता है तो कीमतें और अधिक बढ़ सकती हैं। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि चरम स्थिति में तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकता है।






